1 00:00:02,520 --> 00:00:06,520 बदलता परिदृश्य. 2 00:00:13,520 --> 00:00:14,820 संगीत मधुर है न? 3 00:00:15,960 --> 00:00:18,320 पर सोचिये यदि आपको किसी प्रकार की श्रवण बाधा होती? 4 00:00:18,320 --> 00:00:21,850 यदि आपमें लघु आवृत्ति को सुन पाने की क्षमता न होती. 5 00:00:23,180 --> 00:00:24,980 या फिर आप ऊंची आवृत्तियों को न सुन पाते हों. 6 00:00:26,780 --> 00:00:29,470 ऐसा ही कुछ खगोलशास्त्रियों के साथ भी होता था. 7 00:00:30,170 --> 00:00:35,480 मनुष्य की आँख ब्रह्माण्ड से मिल रहे विकिरण के केवल एक छोटे से हिस्से के लिए संवेदी होती है. 8 00:00:35,480 --> 00:00:39,500 हम बैंगनी प्रकाश से छोटी तरंगों 9 00:00:39,500 --> 00:00:41,560 या लाल प्रकाश से लंबी तरंगों को नहीं देख सकते. 10 00:00:42,290 --> 00:00:45,410 इस तरह हम ब्रह्मांड की महान संगीत रचना का पूरी तरह आनन्द नहीं उठा पाते. 11 00:00:47,520 --> 00:00:53,020 अवरक्त प्रकाश, इन्फ्रारेड रेडिएशन या गर्मी के विकिरण के खोज प्रथम वर्ष 1800 में विलियम हर्शल द्वारा हुयी थी. 12 00:00:56,600 --> 00:00:59,650 एक अँधेरे बंद कमरे में आप मुझे नहीं देख सकते. 13 00:01:00,520 --> 00:01:05,100 पर यदि आप इन्फ्रारेड गॉगल्स पहन लें आप मेरे शरीर के गर्म हिस्से देख पायेंगे. 14 00:01:08,210 --> 00:01:14,310 ठीक इसी प्रकार अवरक्त प्रकाश दूरबीनें उन ब्रह्मांडीय पिंडों को उजागर करती हैं जो इतने ठंडे होते हैं कि उनसे दृश्य प्रकाश का उत्सर्जन नहीं होता, 15 00:01:14,310 --> 00:01:18,900 जैसे वे गैस-धूल के बने काले जिनमें तारों और ग्रहों का सृजन होता है. 16 00:01:28,020 --> 00:01:29,090 कई दशकों से, 17 00:01:29,090 --> 00:01:31,770 'ईएसओ' के खगोलशास्त्री इस ब्रह्माण्ड को इन्फ्रारेड प्रकाश में 18 00:01:31,770 --> 00:01:33,690 खंगालने की चाहत रखते थे. 19 00:01:34,430 --> 00:01:37,370 पर आरंभिक इन्फ्रारेड प्रकाश संसूचक बहुत छोटे थे और प्रभावशाली न थे. 20 00:01:38,010 --> 00:01:41,130 उनसे हमें इन्फ्रारेड आकाश का एक धुंधला स्वरुप दिखाई दिया. 21 00:01:43,410 --> 00:01:47,050 आधुनिक इन्फ्रारेड कैमरे आकार में बड़े तथा शक्तिशाली हैं. 22 00:01:47,050 --> 00:01:51,930 उनकी सुग्राहिता को बधाने के लिए उन्हें बहुत ठंडा किया जाता है. 23 00:01:53,520 --> 00:01:58,340 और 'ईएसओ' की वैरी लार्ज टेलीस्कोप की बनावट इनका भरपूर उपयोग करती है. 24 00:02:03,230 --> 00:02:10,100 सच तो ये है कि हमारे कुछ जादुई तकनीकें, जैसे इंटरफैरोमैट्री, केवल इन्फ्रारेड में ही काम करती हैं. 25 00:02:12,470 --> 00:02:16,710 हमने अपने आयाम का विस्तार किया है - इससे ब्रह्मांड का नया पक्ष उजागर हो रहा है. 26 00:02:20,380 --> 00:02:26,340 यह काला धब्बा ब्रह्मांडीय धूल से बना है. इसने अपने पीछे के तारों को छिपा रखा है. 27 00:02:26,340 --> 00:02:31,050 पर इन्फ्रारेड का उपयोग कर हम इस धूल को भेदकर देख सकते हैं. 28 00:02:33,080 --> 00:02:36,560 ये है ओरायन नेबुला या मृग नीहारिका - तारों की एक पौधशाला. 29 00:02:36,560 --> 00:02:40,990 अधिकांश नवजात तारे धूल के बादलों में छिपे रहते हैं. 30 00:02:40,990 --> 00:02:47,240 एक बार फिर इन्फ्रारेड हमें राहत देती है - त्तारों के जन्म की प्रक्रिया दिखा कर. 31 00:02:58,440 --> 00:03:02,250 मृत्युगामी तारे गैस के बुलबुलों की उच्छ्वास उत्सर्जित करते मिलते हैं. 32 00:03:02,250 --> 00:03:05,970 दृश्य प्रकाश में ये देखते ही बनते हैं. 33 00:03:05,970 --> 00:03:10,150 पर इन्फ्रारेड में ली गयी छवि और अधिक ब्यौरा देती है. 34 00:03:12,500 --> 00:03:14,840 इन्फ्रारेड तकनीक द्वारा लिए गए तारों और गैस के बादलों के दृश्यों को न भूल जायिएगा 35 00:03:14,840 --> 00:03:19,830 जिनका भक्षण आकाशगंगा के केन्द्र का भस्मासुर श्याम विवर या ब्लैक होल कर रहा है. 36 00:03:19,830 --> 00:03:23,510 इन्फ्रारेड कैमरे के बिना हम इन दृश्यों से वंचित रह जाते. 37 00:03:25,690 --> 00:03:26,840 इन्फ्रारेड तकनीक से हमने दूसरी मंदाकिनियों का अध्ययन कर 38 00:03:26,840 --> 00:03:31,980 उनमें अपने सूर्य जैसे तारों का वितरण खोजा है. 39 00:03:34,930 --> 00:03:38,609 सुदूर स्थित मंदाकिनियों का अध्ययन केवल इन्फ्रारेड प्रकाश से ही संभव है. 40 00:03:38,609 --> 00:03:41,520 क्योंकि ब्रह्माण्ड के निरंतर प्रसार के कारण 41 00:03:41,789 --> 00:03:44,020 उनका सामान्य दृश्य प्रकाश इन्फ्रारेड क्षेत्र में खिसक आया है. 42 00:03:46,410 --> 00:03:50,750 पारनाल के समीप के एक पर्वत शिखर पर एक इकलौती इमारत है. 43 00:03:51,430 --> 00:03:55,020 इसके अंदर 4.1 मीटर व्यास की 'विस्टा' दूरबीन लगी है. 44 00:03:55,490 --> 00:03:59,040 इसका निर्माण यूनाइटेड किन्ग्डम में हुआ जो 'ईएसओ' का दसवां सदस्य है. 45 00:04:06,620 --> 00:04:09,750 अभी विस्टा दूरबीन इन्फ्रारेड में ही कार्य करती है. 46 00:04:09,750 --> 00:04:14,510 यहाँ एक विशाल कैमरा लगा हुआ है जिसका वज़न एक ट्रक जितना होगा. 47 00:04:14,980 --> 00:04:21,060 सच में, विस्टा दूरबीन ने इन्फ्रारेड में ब्रह्माण्ड की खोज के नए द्वार खोल दिए हैं. 48 00:04:22,400 --> 00:04:26,220 पचास साल पहले अपने जन्म के समय से 'ईएसओ' में दृश्य प्रकाश में खगोलशास्त्र पर काम चल रहा है. 49 00:04:29,360 --> 00:04:32,370 और इन्फ्रारेड में विगत लगभग तीस वर्ष से. 50 00:04:37,720 --> 00:04:40,560 पर ब्रह्माण्ड का नाद पूरी तरह सुनने के लिए ये काफी नहीं. 51 00:04:42,520 --> 00:04:46,720 चिली की एंडीज़ पर्वतमाला में समुद्र तल से पांच हज़ार मीटर ऊपर है 52 00:04:46,720 --> 00:04:48,920 चायनन्तोर का पठार. 53 00:04:50,440 --> 00:04:53,240 खगोलशास्त्र इससे अधिक ऊंचाई पर कहीं नहीं किया जाता. 54 00:04:56,540 --> 00:04:59,260 चायनन्तोर है घर 'एल्मा' का. 55 00:05:00,550 --> 00:05:03,760 एल्मा' यानि एटाकामा लार्ज मिलीमीटर/सबमिलीमीटर एरे. 56 00:05:04,800 --> 00:05:06,680 'एल्मा' अभी निर्माणाधीन है. 57 00:05:07,170 --> 00:05:10,540 यहाँ की परिस्थितियाँ अत्यंत प्रतिकूल हैं - साँस लेना भी दूभर होता है. 58 00:05:13,730 --> 00:05:16,660 अभी यहाँ 66 में से केवल दस एंटेना ही लग पाये हैं, 59 00:05:16,660 --> 00:05:21,180 पर 'एल्मा' ने 2011 की शरद में अपना पहला प्रेक्षण लिया. 60 00:05:25,600 --> 00:05:31,570 अंतरिक्ष से आती मिलीमीटर तरंगें. इनका प्रेक्षण स्थल ऊंचा और शुष्क होना चाहिए. 61 00:05:31,570 --> 00:05:36,330 चायनन्तोर इस मामले में दुनिया के सर्वोत्कृष्ट स्थानों में से एक है. 62 00:05:41,100 --> 00:05:46,880 इन दो मंदाकिनियों की टकराहट से उत्पन्न ये ठंडी गैस एवं काली धूल दिखाई दे रही है. 63 00:05:47,390 --> 00:05:51,960 ये तारों के जन्म नहीं बल्कि उनके संषेचन की स्थली है. 64 00:05:55,060 --> 00:05:58,690 और इस मृत्युप्राप्त तारे से निकलता सर्पिलाकार प्रवाह - 65 00:05:58,690 --> 00:06:01,730 कहीं ये किसी परिक्रमारत तारे के कारण तो नहीं हो रहा? 66 00:06:06,270 --> 00:06:08,000 ब्रह्माण्ड को देखने की नयी तकनीकें विकसित कर 67 00:06:08,000 --> 00:06:12,230 हम ग्रहों, तारों और मंदाकिनियों के उद्भव के रहस्य के और भी निकट आ गए हैं. 68 00:06:12,830 --> 00:06:16,020 - ब्रह्माण्ड के नाद को पूरी तरह सुनने का प्रयास.